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इधर-उधर की बात 84 – बोर्ड पेपर -ब्रिगेडियर पी एस घोतड़ा (सेवानिवृत)

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    " अब मेरी ज़िंदगी खत्म हो गई है। मैंने दो साल मेहनत की और अब सब बेकार चला गया , क्योंकि मुझे सबसे मुश्किल पेपर सेट मिला है ," मैंने मेट्रो में कुछ स्कूल के लड़कों को बारहवीं के फिजिक्स पेपर के बारे में चर्चा करते हुए सुना। " मैं अब इंजीनियरिंग कॉलेज नहीं जाऊंगा ," एक और लड़का बोला , उसकी आँखों में आँसू थे। मैं मुस्कराया। मुझे वो समय याद आया , जब मैं भी फिजिक्स से हारा हुआ महसूस करता था । मेरी कुछ कैलकुलेशन्स ग़लत हो गई थीं। उस वक्त लगा था , जैसे ये मेरी ज़िंदगी की सबसे बड़ी हार है। लेकिन आज मैं महसूस करता हूँ — फिजिक्स सिर्फ एक विषय या कॉलेज की सीट नहीं है । ये असल ज़िंदगी में समस्याएं सुलझाने , रणनीति बनाने और ज़िंदा रहने की कला है। मेरा मन साल 2005 के मस्तान धारा की ओर चला गया — जहाँ फिजिक्स ने मेरी मदद की थी ।  " सॉरी सर , मेरी AK-47 घर के सामने गिर गई ," मेजर संतोष की आवाज़ मेरे ईयरपीस में गूंजी। हम बीते ब...

IDHAR UDHAR KI BAAT 84- BOARD EXAMS Brig PS Gothra (Retd)

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“This is the end of my life. For two whole years I worked hard and the whole thing is zero as I got the toughest set of paper,” I overheard some schoolboys discussing Class 12 physics exam on the metro ride. "I am not going to Engineering college,” said another boy in tears. I smiled, remembering a time when I, too, had felt defeated by physics. I had gone wrong in some calculations. It seemed like the biggest disaster of my life back then. But today I feel, Physics was not just about exams and securing a seat in college. It was about real-life problem-solving, survival, and strategic thinking. My mind drifted back in 2005 to Mastan Dhara in J&K—to the day when physics helped. "Sorry sir, my AK-47 dropped in front of the house," Major Santosh’s voice crackled in my earpiece. We had been tracking a terrorist’s movements through our thermal devices for 20 days. That dawn, we had him cornered inside a cattle shed (dhok) in Dandiyan Mohalla, Mastan Dhara. Maj...

इधर उधर की बात 83 (पूर्ण सफ़ाई ) ब्रिगेडियर पी.एस. गोथरा (से.नि.)

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     हरि जुग जुग भगत उपाया पैज रखदा आया राम राजे ॥ हरणाखस दुसट हरि मारेया प्रहलाद तराया ॥  ( भगवान सदियों से अपने भक्तों की रक्षा करते आए हैं। उन्होंने भक्त प्रह्लाद को बचाया और दुष्ट हिरण्यकश्यप का संहार किया। )      कीर्तन की मधुर ध्वनि मुझे माँ की गोद जैसी शीतलता दे रही थी। ऐसा लग रहा था मानो समय धीमा हो गया हो , और मैं इस शांत वातावरण में विलीन हो रहा था। लेकिन कुछ ही क्षण पहले , मेरा मन बिल्कुल भी शांत नहीं था। मैं गुरुद्वारे में अपनी इच्छाओं की एक लंबी सूची लेकर आया था , जैसे किसी ईश्वरीय इच्छा - पूर्ति केंद्र पर खड़ा हूँ। मुझे समाधान चाहिए थे , सफलता चाहिए थी , सुरक्षा चाहिए थी। मेरा मन सांसारिक इच्छाओं के बोझ से भारी था। लेकिन एक समस्या थी — कतार बहुत लंबी थी , धीरे - धीरे आगे बढ़ रही थी। मेरे भीतर अधीरता बढ़ने लगी। " लोग इतना समय क्यों ले रहे हैं ? क्या इन्हें नहीं दिख रहा कि और भी लोग इंतजार...