इधर-उधर की बात — खाड़ी का पंचतंत्र Brig PS Gothra (Retd)
एक समय की बात है। जंगल में एक शेर रहता था। बहुत ताकतवर। लगभग जंगल का मालिक। बाकी जानवर उसे राजा मानते थे—कुछ डर से, कुछ मजबूरी से। शेर ने अपने लिए दो “टॉयलेट” बना रखे थे।पहला था NATU, जहाँ भेड़ें रहती थीं। दूसरा था GULF सफेद खरगोशों वाला इलाका। दोनों ही समूह अपने आप को बहुत सभ्य और आधुनिक समझते थे। लेकिन अंदर से थोड़ा अपमानित भी महसूस करते थे। कारण? जब भी शेर अपना काम खत्म करता, तो कभी भेड़ को… कभी खरगोश को उठाकर टॉयलेट पेपर की तरह सफाई के लिए इस्तेमाल कर लेता। अपमान था… लेकिन सुरक्षा भी थी। इसलिए कोई कुछ नहीं कहता था।
जंगल के दूसरे कोने में एक लोमड़ी रहती थी। बहुत चालाक। उस पर अस्तित्व का संकट था। उसे हमेशा लड़ते रहना पड़ता था। सीधे मुकाबले में वह जीत नहीं सकती थी।
तो उसने सोचा, “सीधे नहीं… दिमाग से खेलना पड़ेगा।”
उसी जंगल में एक साही भी रहता था। न ताकतवर… न तेज… न डरावना।ले किन एक खासियत थी—
उसके शरीर पर काँटे थे। और वो काँटे… चुभते बहुत थे।
एक दिन लोमड़ी ने देखा कि शेर “वेनेजुएला” नाम की किसी बोतल का नशा किए हुए है। थोड़ा बहका हुआ, थोड़ा आत्मविश्वास से भरा।
लोमड़ी ने मौका देखा। उसने चाल चली। धीरे-धीरे उसने साही को उस जगह ला खड़ा किया जहाँ शेर आमतौर पर खरगोश उठाता था।
नशे में शेर ने देखा भी नहीं। आदत से मजबूर था। उठाया… और इस्तेमाल कर लिया। बस… यहीं गलती हो गई। काँटे… जहाँ नहीं लगने चाहिए थे… वहाँ लग गए। शेर उछल पड़ा। गुस्से में दहाड़ा। अपने सलाहकारों को बुलाया।
सलाहकार बहुत चतुर थे। उन्होंने कहा, “महाराज, चिंता की कोई बात नहीं है। देखिए… साही के आधे काँटे तो टूट गए हैं। अब वह कमजोर हो गया है।”
शेर को तसल्ली मिल गई। उसने मीडिया के सामने कह दिया साही जल्द खत्म होने वाला है। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। असल खेल अब शुरू हुआ। साही अब पहले जैसा नहीं था। वह सीधे हमला नहीं करता था। वह अपने काँटे खरगोशों को चुभाने लगा। धीरे-धीरे, बेचैनी फैलने लगी।
और फिर आया असली मोड़। चोटों की वजह से, बहुत ज़्यादा सूजन आ गई। नतीजतन, रास्ता बंद हो गया। गैस जमा होने लगी। उसमें से बदबू आने लगी। खरगोश घबरा गए। अरब सागर, हिंद महासागर और भूमध्य सागर के पार रहने वाले जानवर भी उस बदबू को महसूस कर रहे थे।
लोमड़ी यह सब देख रही थी। वह कुछ ऐसा समझ गई थी जो शेर नहीं समझ पाया था। यह लड़ाई जीतने के लिए कभी थी ही नहीं। यह लड़ाई तो बस संतुलन बिगाड़ने के लिए थी। आखिरकार शेर सोचने पर मजबूर हो गया। उससे गलती कहाँ हुई थी? क्या साही से पंगा लेने में? या फिर वेनेज़ुएला के नशे में चूर होने में? उसे यह बात काफी देर बाद समझ आई कि साही उसे हराने की कोशिश नहीं कर रहा था। वह तो बस यह पक्का कर रहा था कि जंगल में कोई भी चैन से न रह पाए। और एक और कड़वी सच्चाई थी। शेर ताकतवर तो था। लेकिन वह अपनी ही आदतों का कैदी भी था।
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