इधर-उधर की बात 127 — कम मत आंकिए Brig PS Gothra (Retd)
“कौन सा नशा करते हैं ये गोरे?” मैंने मन ही मन सोचा, जब मैंने पीटर नवरो को यह कहते सुना कि ब्राह्मण रूसी तेल से मुनाफाखोरी कर रहे हैं। मुझे हंसी भी आई… और थोड़ा तरस भी। ऐसी बातें वही करता है जिसने भारत को देखा तो है, पर समझा नहीं है।
कागज़ पर भारत एक देश है। जमीन पर यह एक सभ्यता है—थोड़ी उलझी हुई, थोड़ी अनोखी, लेकिन बहुत टिकाऊ मज़बूत और लचीली ।
हो सकता है उन्होंने अपने पड़ोस—वेनेजुएला वगैरह—को समझ लिया हो। लेकिन एशिया कोई एक्सेल शीट नहीं है। यह एक सभ्यता है, एक सोच है, एक विश्वास और मान्यता है।
वियतनाम, अफगानिस्तान, ईरान, इराक—इतिहास भरा पड़ा है ऐसे उदाहरणों से, जहाँ बाहर वालों ने सोचा कि वे सब समझते हैं… और फिर उन्हें मुंह की खानी पड़ी ।
हम भी कभी धोखा खा गए थे—ईस्ट इंडिया कंपनी से। कमज़ोरी से नहीं…बल्कि इसलिए कि हमारे यहाँ “मेहमान भगवान होता है”।
लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। आज गाँव का आदमी भी सुबह उठते ही मोबाइल खोलता है और व्हाट्सऐप पर ऐसी-ऐसी राजनीतिक समीक्षा करता है कि बड़े-बड़े एंकर पानी भरें। यह अव्यवस्था नहीं है… यह लोकतंत्र का देसी वर्जन है।
हम ब्राह्मणों पर मज़ाक करते हैं, पर सम्मान भी उतना ही करते हैं। उन्होंने सदियों तक ज्ञान को किताबों में नहीं, अपने दिमाग में संभाल कर रखा। अब यह बात किसी ऐसे गोरे को समझाना मुश्किल है जिसकी शिक्षा की कहानी चार पीढ़ियों से आगे नहीं जाती।
लेकिन आज का भारत सिर्फ परंपरा नहीं है। यह एक कमाल का कॉम्बिनेशन है। एक तरफ मछुआरा है जो सितारों से रास्ता पहचान लेता है, दूसरी तरफ आईटी इंजीनियर है जो दुनिया के सिस्टम की नस पकड़ लेता है। एक तरफ गुजराती व्यापारी है जो पैसे को निचोड़ कर भी मुसकुरा सकता है, दूसरी तरफ भारतीय गृहिणी है जिसके पास इतना “सीक्रेट फंड” होता है कि घर सालों चल जाए।
गैस बंद हो जाए? कोई दिक्कत नहीं—चूल्हा जल जाएगा। सप्लाई चेन टूट जाए?
कहीं न कहीं लंगर लग जाएगा।
हमारे यहाँ भूख, सरकार से पहले समाज संभालता है।
और सिस्टम? हम शायद दुनिया का एकमात्र देश हैं जो 130 करोड़ लोगों को एक झटके में रोक भी सकता है और अगले दिन चला भी सकता है। कोविड के समय हमने यह करके दिखाया।
जहाँ दुनिया मास्क ढूंढ रही थी, हम कुछ महीनों में सबसे बड़े PPE उत्पादक बन गए।
हमारा चायवाला QR कोड से पैसे लेता है…और बड़े-बड़े देशों के सिस्टम WiFi जाने पर बैठ जाते हैं।
जब विदेशों में संकट आता है, हम सिर्फ अपने लोगों को नहीं निकालते—
दूसरों को भी साथ निकाल लाते हैं। क्योंकि हम सिर्फ देश नहीं…
एक भरोसा हैं।
हमारा भूगोल भी कम दिलचस्प नहीं है। सियाचिन की बर्फ, राजस्थान का रेगिस्तान, पूर्वोत्तर के जंगल—हर जगह हमारा आदमी फिट बैठ जाता है।
पहाड़ का आदमी बर्फ में तेंदुए जैसी चाल चलता है। रेगिस्तान वाला आदमी लड़ाई में आपकी परछाई बन सकता है और आपको पता भीं नहीं लगेगा। हमारा आदिवासी जंगल में चीते की तरह शिकार कर सकता है।
पाकिस्तान, और आतंकवाद के कारन हमारी सेना के तो मुंह में खून लगा है।
कम टेक्नोलॉजी में भी काम चला लेती है, और जब मौका मिले तो हाई-टेक में भी पीछे नहीं रहती। उसे दर्द सहना आता है…और ज़रूरत पड़े अत्यधिक मात्रा में दर्द देना भी आता है ।
कौटिल्य के बच्चे हैं । हम रूस से तेल लेते हैं, अमेरिका से व्यापार करते हैं,
चीन से मुकाबला करते हैं—और यह सब एक साथ करते हैं।
हम किसी के खेमे में नहीं जाते। हम अपना खेल खुद खेलते हैं।
और सबसे जरूरी बात—भारत अपनी सुरक्षा का जिम्मा किसी और को नहीं देता । साथ चल सकते हैं, पर सहारा नहीं लेता । तो जब कोई बाहर बैठा भारत को सिर्फ किताबें पढ़ कर समझने की कोशिश करता है, तो मुझे बस हसीं आती है।
भारत जल्दी प्रतिक्रिया नहीं देता। भारत सब कुछ सोखता है। और जब जवाब देता है…तो सामने वाले को समझ आ जाता है कि खेल कौन खेल रहा था।
तो पीटर साहब गलत फेहमी में मत रहिये की आप भारतीय समाज को ऐसे वक्तव्यों से बाँट लेंगे। जिस दिन भारत ने ढाई चाल चली आपके परकछे उड़ जायेंगे।
Jai Hind.

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