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IDHAR UDHAR KI BAAT 86- CHILDHOOD PERCEPTION Brig PS Gothra (Retd)

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   "Is Saapad ready?" asked my father, handing over his empty tea cup to the mess boy.    I was four. My sister was three. We exchanged that look—the look that all siblings with an age gap of three years or less know too well. It was the silent confirmation of a shared mission.     Something new and exotic was about to be served for lunch. Saapad.    I leaned in, whispering with all the wisdom of my extra one year of life, "It must be tastier than Papad."    Our expectations shot through the roof. This had to be some royal feast that only officers were privileged enough to eat. We happily trotted along with our father to the officers' mess, stomachs grumbling with anticipation.    And then— the betrayal.    What arrived on the table was plain dal and chawal. Where was the Saapad?!    Unable to contain my disappointment, I turned to my father and asked, "But where is the Saapad?" ...

इधर-उधर की बात 85– पवित्र पेनशन -ब्रिगेडियर पी एस घोतड़ा (सेवानिवृत)

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  " हम रहेंगे कहाँ ?" मैंने पूछा। " सर , वहाँ कोई फौजी मेस नहीं है , मैंने छोटे से होटल में कमरा बुक किया है। हमें अपनी जेब से पैसे देने होंगे , रिइम्बर्स नहीं होगा ," कर्नल थापा ने जवाब दिया । " मैंने उसे तिरछी नज़र से देखा , क्योंकि सरकारी काम पर अपना खर्चा करना मुझे अच्छा नहीं लग रहा था। हम उसकी कार में एक बोर्ड ऑफ़ ऑफिसर्स करने के लिए टेम्पेरोरी ड्यूटी पर जा रहे थे।  " कम से कम आराम तो रहेगा , सर ," उसने आशावादी लहजे में कहा। " लेकिन तुम्हें पता है , कोई यह भी कह सकता है कि हमें होटल में रहते वक़्त सूटकेस भर के पैसे दिए गए थे। तुम्हें विकल्प तलाशने चाहिए थे — कोई सरकारी विश्राम गृह , या फिर सराय ही देख लेते , "   मैंने आधे मज़ाक और आधे गंभीरता से कहा कुछ सेकंड तक वह चुप रहा। उसके चेहरे पर क्षणिक झुंझलाहट की झलक दिखाई दी। दो मिनट बाद , वो जोर से हँसने लगा। मैंने पूछा , “ क्या हुआ ?” “ वो ट्रक के पीछे लिखा पढ़िए। ” मैंने ...